राज्‍य सभा  
संसदीय समाचार भाग - 2
              
सं.  57528 मंगलवार, 6 फरवरी 2018                                              विधायी अनुभाग
9 फरवरी, 2018 के लिए गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्प

                निकाली गई लॉटरी के परिणामस्वरूप, निम्नलिखित संकल्प, यदि वे नियमों के अनुसार हों, शुक्रवार,  9 फरवरी, 2018 को चर्चा के लिए रखे जाएंगे।

किससे प्राप्त हुआê

संकल्प की विषय वस्तु                       

टिप्पणियां

डा. टी. सुब्बारामी रेड्डी

"इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि:-

(i) विश्व की अनुकूल आर्थिक परिदृश्य वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बनाने के लिए भारत को तीव्र आर्थिक विकास और उच्च वृद्धि दर की आवश्यकता है;

(ii)  अवसंरचना विकास, औद्योगिक विकास का एक महत्वपूर्ण संघटक एवं वृद्धि का साधन है;

(iii)  आर्थिक विकास एवं संचार हेतु सड़क नेटवर्क एक अनिवार्य मानदण्ड है;

(iv)  गत कुछ वर्षों में व्याप्त आर्थिक मन्दी से यातायात की वृद्धि में कमी हुई है  और बनाओ, चलाओ तथा हस्तांतरित करो (बीओटी) सड़क परियोजनाओं द्वारा राजस्व वसूली में कमी आई है; और

(v)  कम राजस्व वसूली से ऋण सेवा रियायतग्राहियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और ऋण खाते में व्यापक रूप से बकायों का भुगतान नहीं किया गया है;

यह सभा सरकार से आग्रह करती है कि वह:-

() बीओटी एवं ईपीसी (इंजीनियरी, अधिप्राप्ति एवं विनिर्माण) के तहत सड़क परियोजनाएं प्रदान करने की प्रक्रिया में आने वाले सभी अवरोधों को समाप्त करने के लिए तत्काल एवं ठोस कदम उठाए;

()  बाजार के विश्वास को बहाल करने तथा यह सुनिश्चित करने के उपाय करे कि नकद प्रवाह अवरोधों, प्रीमियम भुगतान की समय सूची में बदलाव के कारण बीओटी परियोजनाओं का निष्पादन प्रभावित न हो;

 

()  चूंकि इन परियोजनाओं में बड़ी राशि अंतर्ग्रस्त होती है और विवादों के कारण सड़क परियोजनाएं लगभग रुक जाती है, अत: विवादों का शीघ्र निपटान करने की पहल करे तथा इनका सौहार्दपूर्ण समाधान निकाले;  और

() अवसंरचना उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए सड़क क्षेत्र के प्रचालकों को, कम ब्याज दर पर पुन: वित्त पोषण/सुलभ ऋण उपलब्ध कराए ।"

(गृहीत, इसे लॉटरी में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।)

डा. सत्यनारायण जटिया

"इस सभा का मत है कि सामाजिक तथा आर्थिक लोकतंत्र को सार्थक करने के लिए भारत के संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए आगामी तीन वर्षों में समयबद्ध कार्य योजना के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, समता और समानता प्राप्त करने के लिए प्रभावी उपाय किए जाएं।"[1]

(गृहीत, इसे लॉटरी में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।)

 श्री भूपेन्द्र यादव

"इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि-

(i)  लोक सभा एवं राज्य विधान सभाओं के चुनाव एक साथ नहीं होने के कारण बमुश्किल ही कोई ऐसा वर्ष होता है जब देश में चुनाव न हों।  इसमें बहुत समय लगता है और पैसे, मानव श्रम एवं अन्य संसाधनों की भारी बर्बादी होती है;

 

(ii)  पृथक-पृथक चुनाव होने के कारण स्थिरता, शासन, प्रशासन पर असर पड़ता है और लोगों की शिकायतों के निवारण में बाधा आती है और इसके साथ-साथ चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के लागू होने के कारण आर्थिक वृद्धि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है;

(iii)  भारत निर्वाचन आयोग एवं राज्य निर्वाचन आयोगों के पास अलग-अलग मतदाता-सूचियां होती हैं जिससे मतदाताओं के नामों की पुनरावृत्ति  हो जाती  है और चुनावों में धांधली होती है, परिणामस्वरूप इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को निष्पादित करने में बड़ी मात्रा में धन का व्यय भी होता है;

(iv)  कई रक्षाकर्मियों, कतिपय श्रेणियों के सरकारी कर्मचारियों व विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं आदि को भौगोलिक रूप से पृथक स्थानों पर रहने के कारण अपने मताधिकार के उपयोग से वंचित रहना पड़ता है;

(v)  सार्वजनिक निधियन,  जो कि कई देशों में प्रचलन में है, के न होने से, निर्वाचन तंत्र में भारी मात्रा में काले धन को लगाया जाता है, जिससे कई अवांछित तत्वों को चुनावी राजनीति में प्रवेश का मार्ग भी मिल जाता है;

(vi)  यद्यपि निर्वाचन आयोग, चुनाव के स्वरूप के आधार पर, चुनाव-प्रचार पर किए जाने वाले खर्च की सीमा तय करता है, किंतु इस तरह की सीमाएं व्यावहारिक रूप में मात्र कागजों तक सिमट कर रह जाती हैं और एक चुनाव के प्रचार पर होने वाला वास्तविक खर्च, तय की गई सीमा से प्राय:  बहुत ज्यादा होता है;

(vii)  निर्वाचन और अन्य सम्बद्ध विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2003 प्रत्येक उम्मीदवार के चुनाव में व्यय नियंत्रित करने का उपबंध करता है, परंतु जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव नगण्य हैं क्योंकि विद्यमान व्यवस्था में पारदर्शिता का अभाव है;

(viii) मजबूत विधायी आधार और प्रभावी कार्यान्वयन तंत्र के न होने से तथा कानूनी तौर पर स्वीकार्य सार्वजनिक कोष के अभाव में उम्मीदवारों को उनके अबाधित प्रचार-प्रसार को सुनिश्चित करने के लिए कोई नियमित सहायता न मिलने से प्रत्येक चुनाव के दौरान खुद ही धन का इंतजाम करना पड़ता है, जिससे स्वाभाविक रूप से राजनीति में काले धन का प्रसार बढ़ता जाता है और भ्रष्टाचार एक सांस्थानिक रूप ले लेता है ;

(ix)  राजनीतिक दलों के निधियन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी  उपायों के अभाव में अधिकारवादी सत्ता के ढांचों के सृजन द्वारा वर्तमान स्थिति और बिगड़ गई है जिन्हें इनका लाभ उठाने वाले छोड़ना नहीं चाहते और राष्ट्रीय राजनीति में भी दबाव बनाना चाहते हैं; और

(x)  चुनावों में अत्यधिक खर्च होने के कारण वे लोग, जिनके पास वित्तीय संसाधनों की कमी है, चुनावों में मुकाबला नहीं कर पाते और भेदभावपूर्ण नीति-निर्णय इसका अपरिहार्य परिणाम होता है,

यह सभा सरकार से आग्रह करती है कि वह-

() निर्वाचन एवं अन्य संबंधित विधियों को तत्काल संशोधित करे ताकि लोक सभा एवं विधान सभा चुनाव एक साथ कराए जा सकें जिससे सत्तारूढ़ सरकार को शासन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए पूरे पांच वर्षों का समय मिल सके;

() विधियों एवं नियमों को इस रीति से संशोधित करे जिससे चुनावी खर्च की सीमा तय करने और चुनाव-प्रक्रिया में समय की बर्बादी रोकने के लिए चुनावी चक्र में सुधार किए जा सकें;

() नकली मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाने, चुनावी धांधली पर रोक लगाने तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अमली जामा पहनाने में होने वाले खर्च को कम करने के लिए निर्चाचन आयोग को देश में मात्र एक मतदाता सूची तैयार करने को कहे;

() ई-बैलेट/ई-मतदान प्रणाली आरंभ करने के लिए संविधान एवं अन्य संगत अधिनियमों में संशोधन करे ताकि सभी मतदाता, जो अलग-अलग कारणों से अपने निवास स्थान से दूर हैं, अपने मताधिकार का ऑनलाइन इस्तेमाल कर सके;

(.) चुनावों के सार्वजनिक निधियन को लागू करे;

() राजनीतिक दलों द्वारा निधियों के उपयोग को विनियमित करने के लिए संगत कानूनों का निर्माण करे अथवा उनमें उपयुक्त संशोधन करे;

() लोकतंत्र को मजबूत करने, राजनैतिक वित्त पोषण में पारदर्शिता लाने तथा अन्य आवश्यक सुधारों के लिए कदम उठाए;

() देश के प्रत्येक पात्र नागरिक को जारी किए गए मतदाता पत्र से आधार संख्या को जोड़े; और

() अनिवासी भारतीयों तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों को चुनाव के दौरान मतदान करने की अनुमति दे।"

(गृहीत, इसे लॉटरी में चतुर्थ स्थान प्राप्त हुआ।)

श्री विवेक गुप्ता

     "इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि -

(i)  भारत का संविधान भारत के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है;

(ii) रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स (आरडब्ल्यूबी) द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में वर्ष 2017 में 192 देशों में भारत का स्थान 136वां है;

(iii) पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को धमकाना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है;

(iv) प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और इसलिए इसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जाना महत्वपूर्ण है;

(v)  समाचार माध्यम नागरिकों को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों और सरकार के साथ जुड़ने के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराते हैं;

(vi) कार्य संबंधी धमकियों और पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा के मामलों में वृद्धि हो रही है और हाल ही में 5 सितम्बर, 2017 को सुश्री गौरी लंकेश को गोली मार दी गई है;

(vii) राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में मीडिया कर्मियों पर हमलों के केवल वही मामले दर्ज किए जाते हैं जिनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 325, 326, 326क और 326ख के तहत आने वाली 'विभिन्न प्रकार की गंभीर चोट' पाई जाती है लेकिन पत्रकारों की हत्या के मामले शामिल नहीं किए जाते और इस प्रकार बहुत कम मामले दर्ज किए जाते हैं;

(viii) ऐसे मामले कम संख्या में दर्ज किए जाने के कारण देश में कार्य संबंधी धमकियों का सामना कर रहे पत्रकारों की संख्या को बहुत कम करके आंका जाता है;

(ix) एनसीआरबी के आंकड़ों से स्वत: पता चलता है कि 2014 से 2015 के बीच पत्रकारों को गंभीर रूप से चोट पंहुचाने वाले 142 हमले हुए;

(x) पत्रकार संरक्षण समिति (सीपीजे) के अनुसार 1992-2016 के बीच भारत में मारे गए 70 पत्रकारों में से 28 की हत्या की गई थी;

(xi) 26 जुलाई, 2017 को राज्य सभा में एक प्रश्न के संबंध में माननीय गृह राज्य मंत्री द्वारा दिए गए उत्तर के अनुसार 2014 से 2015 के बीच पत्रकारों पर हुए 142 हमलों के लिए केवल 73 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया;

(xii) मीडिया कर्मियों पर हमले के पंजीकृत मामलों और इन हमलों के लिए गिरफ्तार व्यक्तियों की संख्या के संबंध में राज्यों के बीच असमानता है, उदाहरण के लिए, वर्ष 2014-15 में उत्तर प्रदेश में ऐसे सर्वाधिक मामले (64) दर्ज किए गए थे, लेकिन केवल 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया था जबकि मध्य प्रदेश में पत्रकारों पर हमले के 26 मामले दर्ज किए गए थे, और 42 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

(xiii) पत्रकारों के विरूद्ध अपराधों के लिए गिरफ्तार व्यक्तियों की सजा दर गिरफ्तारी से भी कम है;

(xiv) पत्रकारों के विरूद्ध हत्या के मामले में ग्लोबल इंप्यूनिटी इंडेक्स में 2015 में विश्व स्तर पर भारत का स्थान 14वां है, जिसकी गणना पत्रकार संरक्षण समिति (सीपीजे) द्वारा सूचित अनसुलझी हत्याओं की संख्या के आधार पर की जाती है;

(xv) पिछले एक दशक में भारत में पत्रकारों की हत्या का एक भी मामला हल नहीं किया गया और पत्रकार संरक्षण समिति (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1992 के बाद से मीडिया कर्मियों पर हमले के 96% मामलों को अभी तक हल नहीं किया गया है;  

(xvi) हमारी दांडिक न्याय प्रणाली में मीडिया कर्मियों के हमलावरों के लिए कोई कठोर निवारक नहीं है, जिससे खोजी पत्रकारिता/रिपोर्टिंग निरंतर खतरनाक हो रही है;

(xvii) भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) ने पत्रकारों पर हमला करने को पांच साल के कारावास के साथ दंडनीय एक संज्ञेय अपराध बनाने की सिफारिश की है;

(xviii) भारतीय दंड संहिता में पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के विरूद्ध काम संबंधी खतरों और अपराधों से निपटने के लिए एक अलग धारा नहीं है; और

(xix) पूरे देश में पत्रकारों और मीडिया समुदाय की समग्र सुरक्षा और संरक्षा के लिए कोई व्यापक योजना नहीं है,

यह सभा सरकार से आग्रह करती है कि वह-

() वरिष्ठ पत्रकार सुश्री गौरी लंकेश की हत्या की सीबीआई जांच कराए;

() काम से जुड़ी धमकियों का सामना कर रहे पत्रकारों की संख्या का वास्तविक अनुमान लगाने तथा दक्षता के साथ उनके संरक्षण, सुरक्षा तथा कल्याणकारी उपाय करने की योजना बनाने में सहायता प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी व्यापक सर्वेक्षण कराए;

() ऐसे मीडिया कर्मी जिन पर हमला हुआ हो या धमकी दी गई हो, के लिए एक मजबूत शिकायत निपटान प्रणाली स्थापित करे;

() अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाए रखने की दृष्टि से काम से जुड़ी धमकियों का सामना करने वाले पत्रकारों को विशेष संरक्षण प्रदान करे;

(.)  विशेष रूप से और मीडिया कर्मियों के लिए, जब उन्हें किसी प्रकार का खतरा महसूस हो उस समय पुलिस से संपर्क करने के लिए टोल फ्री नंबर मुहैया कराए;

() प्रेस एवं मीडिया से जुड़े कर्मचारियों को प्रभावी सुरक्षा मुहैया करने जैसे सुरक्षोपाय करने में राज्यों की सहायता करे;

() देश भर में पत्रकारों और मीडिया समुदाय के समग्र संरक्षण और सुरक्षा के लिए राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय के साथ एक छत्रयोजना बनाए;

() प्रेस और मीडिया से जुड़े लोगों को सुरक्षा प्रदान करने की योजना की निगरानी करने के लिए गृह मंत्रालय के अधीन एक पृथक खंड स्थापित करे;

() पत्रकारों एवं मीडिया कर्मियों के विरुद्ध अपराधों से जुड़े मामलों के विचारण के लिए न्यायालयों में विशेष खंडपीठ स्थापित करे;

 

 

() प्रेस की स्वतंत्रता को कम करने और उसे खतरे में डालने वाले अपराधियों तथा पत्रकारों का दाण्डिक न्याय व्यवस्था में विश्वास मजबूत करने के लिए ऐसे दोषियों के विरूद्ध न्यायिक कार्रवाई करने के लिए कानूनों को कठोर बनाए; और

() मीडिया कर्मियों के विरुद्ध अपराधों से निपटने के लिए एक पृथक धारा को शामिल करने तथा पत्रकारों एवं अन्य मीडिया संबंधी कर्मियों के जीवन को खतरे में डालने के लिए दोषियों को कठोर दण्ड के उपबंध को शामिल करने के लिए भारतीय दण्ड संहिता का संशोधन करे।

(गृहीत, इसे लॉटरी में पांचवा स्थान प्राप्त हुआ।)



[1] संकल्प की मूल सूचना हिन्दी में प्राप्त हुई

देश दीपक वर्मा
महासचिव